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मी टू अभियान नहीं, आंदोलन है

आत्मा का अंधियारा पक्ष है यौन हिंसा


-गीताश्री

दस साल पहले महिला एक्टिविस्ट तराना बुर्के ने जब अपना दुख-दर्द दुनिया से साझा करते हुए कहा होगा कि यह दुख मेरी आत्मा की गहराई में धंसा हुआ है और मेरी आत्मा का अंधियारा पक्ष है, तब दुनिया ने बहुत गौर से इसे नहीं सुना, न ही खास तवज्जो दी। उस समय किसी को अहसास नही होगा कि एक दशक में दुनिया इतनी बदल जाएगी कि उन समाजो की स्त्रियां भी यौन हिंसा की बातें सार्वजनिक रुप से कबूलने लगेंगी, जो अब तक पर्दे में थीं। या जो अब तक लोकलाज से चुप थी।
उस समय भी वह अभियान नहीं , एक आंदोलन था जिसे दस साल लगे, दुनिया भर की स्त्रियों को जोड़ने में। अब तक का ये सबसे तेजी से फैलने वाला अभियान साबित हुआ जो न सिर्फ स्त्रियों में बल्कि पुरुषों में भी खासा लोकप्रिय हो गया। दुनिया भर की स्त्रियां इससे जुड़ चुकी हैं। अपना दुख संकेतों में साझा कर रही हैं।
यह अभियान फिर से जिंदा तब हुआ जब अभिनेत्री एलिसा मिलैनो ने यौन हिंसा की शिकार रही सभी महिलाओं और लड़कियों से आगे आकर यह हैशटैग चलाने का आग्रह किया, जिससे लोगों को स्थिति की गंभीरता का अहसास हो सके. अभी भी यौन हिंसा की पीड़ित लडकियां अपना मुंह खोलने से डरती हैं. वे अभी तक सामाजिक लोकलाज के दायरे से बाहर नहीं निकल पाई हैं.यह हैशटैग बहुत ही जल्दी महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसने शायद उन्हें उस दर्द को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की हिम्मत दी. उनकी घुटन को किसी न किसी तरह से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया.
इस अभियान की प्रेरणा तराना ने दुबारा इसके जिंदा होने पर कहा कि यह किसी एक स्त्री का विलाप नहीं है, यह आंदोलन है और सभी भुक्तभोगियों को खुल कर सामने आना चाहिए।
तराना के इस अपील ने न सिर्फ इसे फिर से जिंदा किया बल्कि सबको उकसाया भी। नतीजा इसी महीने फिर से यह अभियान शुरू होकर पूरी दुनिया में फैल गया।
इसने पूरी दुनिया की महिलाओं को उनका दर्द साझा करने के लिए प्रेरित किया. जब यह हैशटैग भारत आया तो भारत में न केवल आम स्त्रियों ने बल्कि बड़ी बड़ी हस्तियों ने इसमें अपने अनुभवों को साझा किया.
पश्चिम और भारत के अनुभवों में एक बात बहुत हटकर थी कि जहां पश्चिम में महिलाओं ने अपने अनुभवों को साझा किया, वहीं भारत में ऐसा नहीं हुआ. यहाँ पर लड़कियों ने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को स्वीकार तो किया, उन्होंने यह तो कहने की हिम्मत की, कि उनके साथ गलत हुआ, मगर कितना गलत हुआ और किसने गलत किया, यह स्वीकार नहीं किया.
आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है? इसकी वजह शायद सामाजिक रूप से अस्वीकृति ही रही होगी. जहां पश्चिम में वे अपनी घुटन से बाहर निकल सकीं, वहीं भारत में यह घुटन कहीं और तो नहीं गहरा गयी क्योंकि इसने उन्हें उस दर्द को बाहर तो निकालने के लिए उकसा दिया, मगर कहीं न कहीं उस दर्द को पूरा नहीं वे बता सकीं क्योंकि शायद यहाँ पर सामाजिक बहिष्कार का भय उनके इस साहस पर भारी पड़ गया. जिस समाज में यौनशुचिता ही चरित्र का पैमाना होती है, उस समाज में स्त्रियों को यह  भी कहने के लिए अभी भारी साहस जुटाना होता है कि उनके साथ कहीं न कही गलत हुआ था.
अगर भारतीय स्त्रियां खुल कर लिखने लगे तो सारा सामाजिक-पारिवारिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा। यही भय अभी तक स्त्रियों को सता रहा है। सिर्फ मी टू लिख कर शेयर करने से आंदोलन को गति नहीं मिलती है। जब तक कि उसके मामले सामने न आएं और दुनिया की आंखो पर पड़ी पट्टी न हट जाए। यह खतरा कौन मोल ले। बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसी बात है।
फिल्म जगत में कास्टिंग काउच के बारे में खुल कर बताने वाली हीरोइनो के साथ अच्छा सुलूक नहीं होता है, अगर स्त्रियां अपने आंगन के आतंक के बारे में बताने लगें तब उनका जीना दूभर हो जाएगा। स्त्रियां इस भय में हैं मगर एक बात तो है कि उन्हें इस आंदोलन से इतना साहस तो मिला कि वे स्वीकार कर सकीं। अब तक स्वीकार ही कहां था।
आज हम बच्चियों को गुड टच और बैड टच समझा रहे हैं। बीस साल पहले यह सीख कहां थी। न जाने कितने घरो में, लगभग सौ में निन्यानवें स्त्रियां बचपन से लेकर बड़ी होने तक यौन हिंसा का शिकार हुई हैं। अब तक मामला दबा रह जाता था। इज्जत के डर से घरवाले मामले को दबा जाते थे। इससे लड़की और परिवार की ही बदनामी होती थी। दूसरी बात कि अधिकांश बच्चियों को यह नहीं पता होता था कि उनके पहचान वाले उनके साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। बच्चियों के सथ खेल खेल के नाम पर उनके सगे ही उनका यौन शोषण करते रहे हैं, बच्चियां अनभिज्ञ थीं। जागरुकता तो अब आई है।
याद होगा कि एक दशक पहले लेखिका पिंकी विरमानी की किताब बिटर चॉकलेट आई थी। जिसमें बचपन में किए गए यौन शोषण का पूरा चिट्ठा दर्ज था। वह किताब आई, गई हो गई। समाज तब भी न चेता। अधिकांश भारतीय घरों में अब भी उतनी सजगता और सतर्कता नहीं है। अब भी यौन हिंसा की शिकार स्त्रियां आज भी घुटन में जी रही हैं। यह अभियान उनको मंच तो दे रहा है, लेकिन खुल कर बोलने का साहस नहीं। जब तक खुलेंगी नहीं, यौन हिंसा रुकेगा नहीं। लोग एक्सपोज नहीं होंगे, तो लगाम लगेगी नही। यह भियान सफल नहीं होगा।
मी टू महज अभियान बन कर रह जाएगा, आंदोलन का रुप नहीं लेगा।

इस अभियान में बड़ा आंदोलन बनने की पूरी संभावना है, अगर भारतीय स्त्रियां खुल कर बोलने का साहस जुटाएं। यौन हिंसा के मामले में जीरो टॉलरेंस की सख्त जरुरत है।

अन्यथा, इस तरह का हैशटैग स्त्रीवादी आंदोलन के विरोधियों को भी आलोचना का एक मौका दे देता है कि आधी आबादी बदलाव के लिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई।


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समीक्षा
            सीमित आकाश के बाहर अनंत उड़ान की कहानियां
                                                                  प्रताप दीक्षित
    


वर्तमान समय विपरीत भंगिमाओं का समय है. इस परिदृश्य में स्त्री की नियति कुछ ज्यादा ही त्रासद हुई. बदलते समय के साथ स्त्री कि दुनिया क्या वास्तव में बदली है? दार्शनिक-चिन्तक विटेंगेस्टीन के अनुसार (पैराडोक्स ऑफ ट्रुथ) यह सत्य का एक पक्ष है. स्त्री के संसार का द्वार उस अंतहीन जंगल में खुलता है जिसमें कितनी ऊबड़-खाबड़ संकरी पगडंडियाँ, खंदक, कांटेदार पेड़ और खाइयां हैं कि उसकी कोई मुक्कमिल तस्वीर नहीं बनती. पुराने अंधेरों से निकल कर वह चकाचौंध भरे अंधेरों में गुम हो गई है. उसके अस्तित्व का मापदंड एक मनुष्य की भांति उसकी मानसिक-बौद्धिक क्षमताओं के बजाय दैहिकता के आधार पर आज भी किया जाता है. आयातित स्त्री विमर्श की विडम्बना यह है प्रतिरोध स्वरुप स्त्री होने की अस्मिता से ही वह पलायन कर रही है. पुरुष के साथ सह-अस्तित्व के विपरीत सम्पूर्ण पुरुष समाज को शत्रु-शोषक के कटघरे में खड़ा कर दिया.
     इस परिप्रेक्ष्य में ‘स्वप्न, साजिश और स्त्री’ की कहानियां पल-प्रतिपल बदलती दुनिया में स्त्री के बहाने इतिहास, समाज, समय, मनोविज्ञान, परिवार के साथ समय और समाज को पर्त-दरपर्त खंगालती हैं. स्त्री विमर्श को दैहिक मुक्ति-दयनीयता तक सीमित करने की कोशिशों को नकारते हुए सामजिक मूल्य संरचनाओं को रचनात्मक अनुभवों में बदलती हैं. स्त्री के उस रूप की तलाश, जो बार-बार धुंधलके के आवरण में ओझल हो जाता है. यह कहानियां स्त्री के प्रचिलित, दैहिक-भावनात्मक विमर्श के बरक्स बदली हुई स्त्री के सपनों, अकेलेपन, अनंत आकाश के विस्तृत आयामों, आकांक्षाओं, त्रासदियों, विस्थापन के सतह के यथार्थ से परे, नए यथार्थ का सृजन करती हैं. गीता श्री स्त्री के अंदर की दुनिया की अनेक अनजान तहों का उत्खनन करती हैं.
       ‘डायरी, आकाश और चिडियाँ’, ‘कहाँ तक भागोगी’, ‘लकीरें’ स्त्री के अकेलेपन, सपनों, विद्रोह और स्वयं की तलाश की कहानियां हैं. किस्सागोई के प्रचिलित मिथक को तोड़ती ‘डायरी, आकाश और चिडियाँ’ की रोली आज के तथाकथित आधुनिक समाज में अकेली नहीं है जिसने अपने सपनो के सृजित काल्पनिक संसार में अपने को बंद कर लिया है. असीम आकांक्षाओं के बीच अकेलेपन की निपट यातना और उनसे निजात पाने के लिए उसके पास विकल्प भी नहीं. एक लड़की के अंदर छिपी दूसरी नितांत अपरिचित लड़की को जानना-पहचानना कितना कठिन होता है. सपने अँधेरे में देखे जाते हैं. सपनों और अंधरों में निरंतर द्वंद्व चलता रहता है यह. सफलता की होड़, पिता-माँ के संबंधों में दरार बच्चों को अकेलपन के अंधेरों में घिरने को विवश कर देते हैं. स्त्री में परकाया प्रवेश की शक्ति होती है. रागिनी (रोली की मौसी) रोली की व्यथा समझती है. आधुनिक जीवन शैली की विडंबना और विरोधाभास है कि माँ को रोली के मिल जाने    की खुशी उतनी नहीं है जितनी चिंता, ‘आखिर लड़की रात को कहाँ रह कर आई? कुछ किया तो नहीं?’   कहानी अकेले रोली की नहीं, अकेली पद गई पूरी पीढ़ी की है.
     एक स्त्री के लिए बाहरी बंदिशों से ज्यादा कठिन उसके अपने बनाये खुद के बंधन भी होते हैं.  धार्मिक आचार संहिताएं भी इन में एक है जिसके कारण वह दोहरी जिंदगी जीती रहती है. इनकी आड़ वह सब कुछ करना चाहती है जो ‘ऐसी’ लड़कियां करती हैं. मजहब से ज्यादा कठिन अपने से भागना होता है. ‘कहाँ तक भागोगी’ बताती है कि अपनी पहचान किसी नैतिक संहिता की मोहताज नहीं होती. ‘लकीरें’ का सत्य है कि स्त्री चाहे गाँव की हो जिसका बेटा चोर है या महानगर की कोठी की जिसके आंसू सूख चुके हैं- स्थिति एक सी होती है – सूख चुकी नदी की भांति. कही स्त्री ही नहीं समूची मानवीय बुनियाद की तलाश करती है.
     प्रेम, समर्पण और छलना की कहानियां हैं – ‘रिटर्न गिफ्ट’, ‘बदन देवी की मेहंदी का मनडोला’ और ‘ड्रीम्स अनलिमिटेड’. ‘रिटर्न गिफ्ट’ कच्ची उम्र के अनकहे प्रेम की कोमल-अप्रतिम गाथा है जिसमें कोई प्रतीक्षा नहीं. कहानी  केवल नीतू-नरेंद्र के वियोग की नहीं, दोनों के बीच आभाव, समाज, वर्ग के कारण आयी दूरी बिना कुछ कहे व्यक्त कर देती है. कहानी क्षण को समय-खंड से अलग कर देती है. उनका मिलना भी तो क्षण में ही सिमटा हुआ था जो देश-काल का हिस्सा नहीं होता. शायद स्त्री की नियति हमेशा ‘वन फॉर सारो’ की ही होती है. स्त्री को देह मात्र समझने की प्रवृत्ति से अलग स्त्री के समर्पित प्रेम के अनाम रिश्ते, आजादी-आत्मनिर्णय और उसकी असीम जिजीविषा कि कहानी है ‘बदन देवी की मेंहदी का मनडोला’. एक स्त्री में ही विकास-सुविधा विहीन स्थिति में भी जीने का जज्बा होता है. यह स्त्री ही है जिसकी चाहत में अधिकार नही होता. इस पेम को समझना आसान नहीं होता – ‘हिसाब-किताब रखने वाले रिश्ते नहीं समझते तो किसी की पीड़ा क्या समझेंगे?’ प्रेम में पवित्रता-नैतिकता ऐसा कुछ नहीं होता. इसी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति हैं कहानी के अंश- ‘इनके बीच था एक अनाम रिश्ते का सुकूनदेह उजाला. नदी पर समुद्र का ज्वार था जो पूर्णिमा के चाँद को निर्वसन देख उफान पर था. लहरों ने चाँद पर फेनिल दुपट्टा फैला दिया था. इसमें न सती का सतीत्व भंग हुआ था और न तपस्वी का तप.’
     सपने हमेशा आयामहीन होते हैं. स्त्रियों की दुनिया में इन्हें और विस्तार मिला है. परन्तु वर्तमान बाजार ने प्रेम, संवेदना और सपनों को स्वार्थ सिद्धि के लिए पुल या जिंस में बदल दिया है. कहानी में दो स्त्रियां प्रेम में छली जाती हैं. हर स्त्री के अंदर एक नदी होती है. लेकिन इन स्त्रियों के अंदर की नदियों का संगम तब होता है जब उन्हें एक ही व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त किये जाने का भास होता है. मीडिया की चकाचौंध के पीछे अँधेरे की दुनिया में राइमा और सोनिया (ड्रीम्स अनलिमिटेड) का दुःख इन्हें एक डोर में बंधता है.
     माँ और बेटी का रिश्ता सबसे निकट का, एक अदृश्य प्राकृतिक डोर से बंधा हुआ, होता है. भले ही ऊपर से कितना द्वंद्व दिखाई दे, एक-दूसरे के दर्द, देह या देह से परे अतृप्त इच्छाओं को माँ ही  समझ सकती है और उसे करने के लिए बिना किसी नैतिक हिचक के किसी सीमा तक तत्पर रहती है. ‘उजड़े दायर’ में बेटी को माँ की सलाह –‘अपनी खुशियों का पता खुद ही ढूढना पड़ता है.’ इसी तरह ‘माई रे मैं तो टोना करिहों’ में माँ सिल्बी को मानसिक रूप से बीमार बेटी की चिंता है – ‘अब तो इसके लिए भी तैयार हूँ कि कोई पैसे लेकर भी इसके साथ कुछ कर ले, शायद ठीक हो जाए.’ देह की अनिवार्यता और उसके विकल्प और उसके हिस्से के सुख की तलाश की कहानियां हैं.
     ऊब, एकरसता और अकेलापन. इससे निजात पाने के लिए रिश्तों के गहराने के बजाय छीजते संबंधों के साथ संवादहीनता बढती गई. इस दूरी को पाटने के लिए बढ़ते  संचार साधनों के बीच खुशी ढूढने की कोशिश में हमने दूसरों को ही नहीं अपने को भी छलने के लिए अभिशप्त होते गए.  बाजार ने मुनाफे के लिए मोबाइल पर मीठी-आकर्षक-सेक्सी बातों के लिए आवाजें और सुनने वाले दोनों खरीद लिए हैं.  ‘आवाजों के पीछे’ इसी मृगतृष्णा के मायाजाल में पति-पत्नी दोनों धस चुके हैं. बरसों की घुटन के बाद रोशन अंधेरों गुम हो जाने के लिए अभिशप्त. गनीमत इतनी है कि मटमैले, जलकुम्भी के पत्तों से ढंके पानी में ‘सबसे बचा हुआ पानी चमक रहा था.’ इस व्यस्वस्था की दुरभिसंधि ने बौद्धिक जगत को भी जकड़ रखा है. ‘मेकिंग ऑफ बबीता सोलंकी’ सांस्कृतिक-बौद्धिक जगत में प्रायोजित तरीके से, विशेष रूप से स्त्री को प्रमोट करने छद्म का पर्दाफास करती है. परन्तु इस  ‘प्राप्य’ के पीछे धड़ विहीन कितने चेहरों की विडंबनाएं छिपी हैं.
     सपनों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता. अभावग्रस बच्ची, घरेलू नौकर, सुरताली जैसी लड़कियों की आँखों में पलते सपने कुछ ज्यादा ही रंगीन होते हैं. घर में मालकिन की बेटी सुहानी को पहले तो सुरताली को अपने घुँघरू पहन नाचते देख गुस्सा आता है. परन्तु यह बालमन, जो वर्गभेद नहीं मानता, अगले दिन सुहानी थाप दे रही है और सुरताली बेसुध नाच. वर्गांतर की चेतना के साथ यह कहानी बाल नही स्त्री मनोविज्ञान की कहानी है. वह स्त्री जो दूसरी स्त्री की पीड़ा, सपनों, सुख-दुःख को समझती है.
     ‘भूत-खेली’ बदलते समय-समाज में गाँव और वहां के लोग भी दूसरे ध्रुव के बासिंदे हो चुके हैं. एक ओर दुलारे बाबू द्वारा भाई के हिस्से की सम्पति न देने के लिए स्वार्थ, तिकड़में, अन्धविश्वास दूसरी तरफ रिश्तों की बची स्मृतियों के संजोये रखने की कहानी है.
     गीता श्री की कहानियों में त्रासद दुष्चक्र में घिरने की नियति के  बजाय स्त्री के रूपांतर, विकल्प और दिशा-बोध दिखाई देता है. वैक्तिक अनुभूतियों को व्यापक मानवीय सरोकारों से जोडती हैं. एक निश्चित विषय, निश्चित शिल्प और निश्चित निष्कर्ष पर आधारित कहानियों से विपरीत प्रचिलित मिथक को तोडती हैं.   

                                                    प्रताप दीक्षित
                                                    एम डी एच 2/33, सेक्टर एच,
                                                    जानकीपुरम
                                                    लखनऊ 226 021
                                                                                                        M   9956 398 603
                                                                                                  dixitpratapnarain@gmail.com
    
    
   
    



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समीक्षा

प्रार्थना के बाहर एवं अन्य कहानियां
(वाणी प्रकाशन)
---कलावंती




यह नैतिकताओं का संक्रांतिकाल है । गीताश्री की कहानी की नायिकाएँ इस बात को बखूबी सिद्ध करती हैं। वे तेज हैं, समझदार हैं ,पढ़ी लिखी हैं और बेहद संवेदनशील भी हैं। उनकी बोल्डनेस में भी एक मासूमियत है। वे बस उतनी ही शातिर हैं, जितने में अपनी मासूमियत की रक्षा कर सकें। वे बोल्ड हैं पर क्रूर नहीं हैं। सबसे बड़ी बात कि वे अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार हैं और बहुत साफ ढंग से सोचती हैं। गीताश्री ने अपनी भूमिका में ही लिखा है "जो रचेगा, वही बचेगा। एक और जहां है उसी जहां की तलाश में मेरी आग चटक रही है। देर हो चुकी है ।जहां ढेर सारे मठ- महंत पहले से पालथी मारे बैठे हैं। वहाँ मैं अब बहुत देर से प्रवेश कर रही हूँ। इस रचनातमक यात्रा में क्या कभी देर हो सकती है।जब उठ चलो तब ही यात्रा शुरू हो गई ।"
वे लिखती हैं "मूल्यों के बीच पिसती हुई स्त्रियाँ खुद कहानी बनती जा रही हैं।मुक्ति के लिए छटपटाती हुई स्त्रियॉं का विलाप शायद मुझे ज्यादा साफ सुनाई देता है। वर्जनाओं के प्रति उनके नफरत का अहसास मुझे ज्यादा होता है।" गीताश्री ने स्त्री विमर्श के नाम पर सिर्फ स्त्रियॉं के गुण गायें हैं ऐसा नहीं हैं। उनकी कहानियों में कमजोर और मजबूत दोनों ही तरह के पुरुष और स्त्री  पात्र मिलते हैं जो आपकी चेतना पर बहुत सारे सवाल छोड़ जाते हैं।
"प्रार्थना के बाहर" संग्रह की पहली कहानी है। "बुरी लड़की को सब मिल गया , अच्छी ऐसे ही रह गई।" रचना को लगा जिंदगी उसके हाथ से फिसल गई है। यह अकेले रचना की छटपटाहट नहीं है ।बहुत सी रचनाएँ हैं पूरे हिंदुस्तान में। पर सोचिए संपन्नता के कितने भी ऊंचे पायदान पर पहुंचा आदमी देर सबेर खुद से मुखातिब होता ही है। बहुत आज़ाद समझे जाने वाले देशों में भी औरतें सुरक्षित नहीं  और औरतें सुरक्षित नहीं तो आपके बच्चे भी सुरक्षित  नहीं। क्या पुरुषों के बराबर बैठकर शराब पी लेने की आज़ादी ही स्त्री की वास्तविक आज़ादी है। गर्भपात अब वैधानिक है तो क्या मूँगफली खाने सा सुलभ हो। जीवन रचने की जो दुर्लभता स्त्री को मिली है वह पुरुष के पास कहाँ । इसलिए स्त्री के लिए शरीर मात्र आनंद की वस्तु हो भी नहीं सकती। प्रकृति ने माँ को बच्चे का सर्वाधिकार दिया है। बहुत झमेलों में उलझी जिंदगी में भी रचना ने चिड़िया सा मन बचाए रखा , क्या यह उसकी उपलब्धि नहीं ? किसी समारोह में पुरस्कार देते प्रार्थना ने क्या उस अजनमें बच्चे को नहीं याद किया होगा । किसी प्रकार का कोई अपराधबोध नहीं होना क्या रचना की उपलब्धि नहीं? आप जिन संस्कारों को छोडते हैं उसके बाद आप कितनी ग्लानि महसूस करते हैं या गौरान्वित होते हैं यह आप पर है।
एक अन्य  कहानी है – गोरिल्ला प्यार । अर्पिता, विशवास करती है और विशवास चाहती है । पर इंद्रजीत पुरुष है। उसे कमाने वाली , आत्मनिर्भर और बौद्धिक लड़की से प्रेम करने का शौक तो है पर बाहर जाती स्त्री के पल पल कि खबर भी उसे चाहिए। इधर अर्पिता बेहद स्वाभिमानी स्वावलंबी लड़की है। "अनुभूति को भी क्या कभी गिना जाता है ।क्या अश्रु और स्वेद की गणना मुमकिन है।" अर्पिता का कहना है कि "जिंदगी हमें  एक ही बार मिलती है। हम उसे दूसरों के हिसाब से जीने में खर्च कर देते हैं।... मेरे इस जीने के तरीके में स्पसटता रहेगी। " परंतु सहेली कि बात ही सच निकली "सोच लेना अर्पिता ... हर रिश्ता कुछ वक़्त के बाद एकनिषठता कि मांग करने लगता है।" अर्पिता का दिल यहाँ टूटा कि "नेह में पगी हुई देह वार दी ।वह बता नहीं पायी इंद्र को, कि कैसे उसने बॉस के प्रेम प्रस्ताव को खारिज करके हमेशा के लिए दफ्तर में अपने लिए एक शक्तिशाली दुश्मन पैदा कर लिया।" उसके बाद ऐसा सलूक। अर्पिता इंद्रजीत से आहत अपमानित होकर फेस्बूक पर मित्र तलाशती है। उसे लोगों का व्यवहार देखकर निराशा होती है ।"मछ्ली कि तरह फंसनेवाली औरत चाहिए …. शेरदिल औरत नहीं....."। इसी इमोशनल ट्रोमा में उस रात वह आकाश से गोरिल्ला प्यार कर बैठती है। सुबह जब इंद्रजीत का फोन आता है तब वह कहती है-" इट इज टू लेट इन्द्र।" अर्पिता क्या सिर्फ देह की प्यास में आकाश तक पहुँच गई या अपने को पूरी तरह टूटने से बचाने के लिए। पुरुष समाज को यह सोचना होगा।
"दो पन्ने वाली औरत" कैरिएर बनाने की होड में लगी औरतों की आपसी प्रतिस्पर्धा की कहानी है। आसावरी और रंजना दोनों अपने अपने तरीकों से संपादक को प्रभावित करने की चेष्टा में है। जब योग्यता देह है तो हर लड़की थोड़े दिन बाद अयोग्य हो जाएगी। सत्ता जिसके पास होगी ऐसी लड़कियां भी उसके पास होंगी ।क्या थोड़ी बड़ी गाड़ी, ज्यादा बड़ा मकान यही उपलब्धि है जीवन की । अपनी नज़रों में न गिरनेवाला कोई काम न करना क्या कोई उपलब्धि नहीं? आसावरी अपनी बौद्धिकता को, ज्ञान को मांजेगी। ऊपर उठेगी, यह आत्मविसवास उसमें क्यों नहीं दिखता ? बल्कि कभी रंजनाओं की कहानी भी लेखिका को  लिखनी चाहिए  कि वे बहुत सारे सम्बन्धों और समझौतों से गुजरने के बाद मिली उपलब्धियों के साथ अपने जीवन में कितनी मजबूत और संतुष्ट हैं? "मेरी प्रतिभा को रोज रोज परीक्षाओं से गुजरना होगा?" हर उस लड़की का द्वंद है जो खुद को बचाए भी रखना चाहती है। मूल्यों का महत्व है उसके लिए।
अपने परिवार से मिले संस्कारों से मिले को ना छोड़ पाने वाली लड़कियों की यह सोच बहुत स्वभाविक है।पर उन्हें यह भी समझना होगा की आखिर कितने समझौते करेंगें आप । सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यदि इतने ओछे समझौते कर ही धन कमाना है तो फिर इतनी पढ़ाई लिखाई क्यों? शुरू  में समझौते कर आगे बढ़नेवाली लड़कियां थोड़े दिन बाद बाज़ार से बाहर हो जाती हैं। ज्ञान और मस्तिस्क को लगातार अपडेट करती स्त्रियाँ ही इस गलाकट प्रतियोगिता में स्वयं को टिकाये रख सकेंगी।
"दो लफ्जों कि एक कहानी" एक बेहद सुंदर प्रेम कहानी है। पूरी कहानी एक सुंदर सी लयबद्ध  कविता है। डेविड का स्वयं का चरित्र एक मजबूत पुरुष चरित्र है। वान्या और पैरीन दोनों ही उसे बहुत प्यार करती हैं। प्रेम क्या सिर्फ सुख भरे पलों को जीने का नाम है ? या उसकी अपनी कोई प्रतिबद्धता भी है। दुख भरे पलों को साथ जीना भी तो प्रेम है। जो आपसे प्रेम करेगा वह आपको किसी तकलीफ में कैसे छोडकर जा सकता है। पैरीं का यह कहना कि उसे जिंदा रखना मेरी पहली प्राथमिकता है। उसके चरित्र की उदादत्ता को दिखाता है।
"अंधेरे में किसी दोस्त के साथ चलना, रोशनी में अकेले चलने से कहीं बेहतर है।"  वह इस यात्रा में वान्या का भी साथ चाहती है भले ही वह साथ मानसिक साहचर्य या संबल कि तरह ही क्यों ना हो।  
"रुकी हुई पृथ्वी" एक साधन सम्पन्न रचनात्मक स्त्री के दिनचर्या से ऊब की कहानी है।"कई बार लगता है कि कामनाएँ भी बेताल कि तरह डाल पर लटक गई हैं।" उसके जीवन में शांतनु हवा के एक ताज़े झोंके की तरह है। उसकी बात सुनने और समझने वाला। घर में पति है पर उसे नेहा की बात सुनने का धीरज नहीं। " वह क्यों नहीं सोचता कि उसे कोई साथी चाहिए जो उससे खूब बातें करें ...प्रोत्साहित करे ... हौसला बँधाये ... उसकी उपलब्धियों पर उसके इतना ही खुश हो ....।" वह अपनी भावनाएं बताती है पर शांतनु डर गया ... एक प्रेम से भरी हुई स्त्री के आवेग से ....।पर अंतत नेहा फैसला करती है कि वह जीवन को बहुत कंप्लीकटेड नहीं बनाएगी...। यहाँ शांतनु की भी तारीफ करनी होगी कि उसने आम पुरुषों कि तरह उसकी ऊब को अपने पक्ष में भुनाने कि कोशिश नहीं की।
"सोनमछरी" की नायिका रूमपा शंकर से बहुत प्यार करती है। पर परिस्थितिवश जब उसे अमित का सहारा लेना पड़ता है तो वह शंकर के लौटने पर भी अमित को छोड़ने को तैयार नहीं होती। गीताश्री की नायिकाएँ साहसी हैं और अपने किए का समूचा दायित्व वे स्वयं लेने को तैयार दिखती हैं। चाहे वह मान सम्मान हो या घोर लांछना। वे प्रेम भी अपनी शर्तों पर करती हैं।
"चौपाल " के बीजू साहब एक अलग ही किस्म के चरित्र हैं॰ शिवांगी के खामोश प्रेमी। जिन्हें बस शिवांगी को देख लेना ही काफी है। उनके चले जाने के बाद शिवांगी उन्हे खोजती फिरती है। धन्यवाद कहने का मौका भी ना मिल सका । पर ऐसे पात्र क्या जीवन भर भुलाए जा सकते हैं?
"ताप" कहानी पाठकों को थोड़े असमंजस में डालती हैं। ऐसा व्यावहारिक रूप से संभव है क्या?" बह गई बैगिन नदी " का असगर जब यह कहता है कि "मैं ... सरजी , पहले तो मैं पैसा ही लेता था लेकिन हमारी अम्मी हराम का पैसा घर लाने को मना करती है।" तो लगता कि यह पृथ्वी अबतक नष्ट नहीं हुई, क्योकि आदमी का जमीर कभी ना कभी जग जाता है।
इन कहानियों का एक कमजोर पक्ष, दूसरे पक्ष यानि रंजना, इंद्रजीत की भावनाओं का पूरी तरह नहीं खुल पाना है।
लेखिका से यह आशा की जा सकती है कि कभी हम उनकी ऐसी कहानियाँ भी पढ़ पाएंगे  जो इन पात्रों के तरफ से लिखी गई होगी , उनकी मनोदशा को दर्शाती हुई।  इसके अलावा लबरी ,फ्री बर्ड , उर्फ देवीजी, एक रात जिंदगी भी अच्छी कहानियाँ हैं।
ये कहानियाँ पितृसत्तातमक समाज की जड़ों पर प्रहार करती हैं और पाठकों को मजबूर करती हैं कि वे भी स्त्रियॉं को मनुष्य की तरह देखना सीखेँ। उनका धीरज अब जबाब देने को है।
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कलावंती, आवास स0 टी 32 बी , नॉर्थ रेल्वे कॉलोनी , रांची 834001, झारखंड. मो 9771484961।